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Thursday, 5 June 2014

Old Emportant GK



गुप्तकाल आर्थिक उपयोगिता के आधार पर भूमि:-

@ क्षेत्र - कृषि करने योग्य भूमि |

@ वास्तु - वास करने योग्य भूमि |

@ चारागाह - पशुओँ के चारा योग्य भूमि |

@ खिल्य - ऐसी भूमि जो जोतने योग्य नहीँ होती थी |
@ अप्रहत - ऐसी भूमि जो जंगली होती थी |





चोल काल मेँ मूमि के प्रकार:-

@ वेल्लनवगाई - गैर ब्राह्मण किसान स्वामी की भूमि |

@ पल्लिच्चंदम - जैन संस्थानोँ को दान दी गई भूमि |

@ ब्रह्मदेय - ब्रह्मणोँ को उपहार मेँ दी गई भूमि |

@ शालाभोग - किसी विधालय के रखरखाव की भूमि |

@ देवदान/तिरुनमटडक्कनी - मंदिर को दि गई भूमि |


मौर्यकाल:-

@ सीता भूमि - सरकारी भूमि को "सीता भूमि" कहते थे |

@ अदेवमातृक - बिना वर्षा के अच्छी खेती होने वाली भूमि को |



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सल्तनतकाल:-

@ उश्र - मुसलमानोँ से लिया जाने वाला भूमि कर |

@ खालसा - पूर्णत: केन्द्र के नियंत्रण मेँ रहने वाली भूमी |



विजयनगर - संस्थापक हरिहर व बुक्का:-

@ उंबलि - गाँव मेँ विशेष सेवाओँ के बदले दी जाने वाली लगानमुक्त भूमि |

@ रत्त कोड़गे - युद्ध के समय मरने वाले सैनिक के परिवार को दी गई भूमि |

@ कुट्टगि - ब्रह्मण , मंदिर के बड़े भूस्वामी जो स्वंय कृषि नहीँ करते थे , किसानो को पट्टे पर देते थे |



भूमिकर के विभाजन, मुगल साम्राज्य मेँ भूमि तीन वर्गो मे:-

@ खालसा भूमि - प्रत्यक्ष रूप से बादशाह के नियंत्रण मेँ |

@ जागीर भूमि - तनख्वाह के बदले दी जाने वाली भूमि |

@ मदद-ए-माश/मिल्क/सयूरगल - अनुदान मेँ दी गई लगानमुक्त भूमि |



दहसाला/टोडरमल बन्दोबस्त:-

@ पोलज - इसमेँ नियमित रुप से खेती होती थी |

@ परती - एक या दो वर्ष के अन्तराल पर खेती |

@ चाचर - तीन से चार वर्ष के अन्तराल पर खेती |

@ बंजर -खेती योग्य भूमि नही थी , तथा लगान नही वसूला जाता था |



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